जनता की समस्या पर ताला, पार्षद की हरकत पर ताली—बड़े नेता की कृपा है निराली”

डोंगरगांव विधानसभा क्षेत्र का हाल ही निराला है। यहां एक पार्षद साहब हैं, जिन्हें नगर के लोग मजाक में “आपत्तिजनक पार्षद” कहने लगे हैं। वजह सीधी है—नगर में कोई भी विकास कार्य हो, सड़क बननी हो, नाली साफ करनी हो, या बत्ती लगनी हो—उनकी आपत्ति सबसे पहले खड़ी हो जाती है।

अधिकारी-कर्मचारी तो उनके नाम से ही सिर पकड़ लेते हैं। उनका कहना है कि पार्षद जी का बात करने का अंदाज ऐसा है कि मीठे में भी मिर्च का स्वाद आ जाता है। आम लोग भी तंग हैं—जनता कहती है कि नेता तो सेवा करने आते हैं, लेकिन यहां तो सेवा की जगह ‘सियासी सेवा-शर्तें’ थोप दी जाती हैं।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि पार्षद जी का यह दबदबा किसी जादू से नहीं, बल्कि बड़े नेता के संरक्षण से चलता है। नगर में चर्चा है कि “पार्षद तो छोटा है, पर नेता बड़ा है”—और यह बड़ा नेता हर मौके पर उनके पक्ष में खड़ा रहता है। अधिकारी भी जानते हैं कि अगर पार्षद से भिड़ गए तो बड़े नेता से सामना करना पड़ेगा। नतीजा—नगर की योजनाएं फाइलों में दबकर रह जाती हैं और जनता सपनों में विकास देखती रह जाती है।

व्यंग्य यही है कि डोंगरगांव में विकास कार्य की मंजूरी अब इंजीनियर या जनप्रतिनिधियों के हाथ में नहीं, बल्कि ‘आपत्ति विभाग के स्वघोषित मंत्री’ यानी पार्षद जी की जुबान पर टिकी हुई है।

जनता अब मजाक में कह रही है—“नगर में जब तक बड़े नेता का छाता खुला है, तब तक छोटे पार्षद की हवा तेज़ चलेगी। बस विकास बेचारा बारिश की तरह रुक-रुक कर ही बरसेगा।”

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