छोटी कहानी के रुप में कहीं जाने वाली लोक विधा है “कंथली”– शुभदा मिश्र

सुप्रसिद्ध कथाकार शुभदा जी का किया गया आत्मीय स्वागत,,,,, आयोजित रही सरस साहित्यिक गोष्ठी

राजनांदगांव /‌ देश की सुप्रसिद्ध कथाकार शुभदा मिश्र के संस्कार धानी आगमन पर उनके सम्मान में छत्तीसगढ़ सृजन साहित्य समिति द्वारा साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्य समिति के संस्थापक व छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के जिला समन्वयक वरिष्ठ साहित्यकार आत्माराम कोशा “अमात्य” के निवास स्थान में आयोजित उक्त साहित्यिक आयोजन में स्थानीय कवि / साहित्यकारों ने उत्साह पूर्वक भाग लिया और कथाकारा शुभदा जी को फूलों  गुलदस्ता भेंट कर आत्मीय ढंग से सम्मान किया गया। इस अवसर पर शुभदा जी ने अपनी चर्चित कहानी पुस्तक “यूँ हसरतों के दाग”  आत्मा राम कोशा “अमात्य” को भेंट की, और कवि साहित्यकारो के बीच अपने सृजन प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए साहित्यिक अनुभवों को साझा किया । उन्होंने कहा कि बचपने में हम अपनी नानी – दादियो से छोटी – छोटी कहानियां सुना करते थे। जिसे छत्तीसगढ़ी में ‘कंथली” कहा जाता है जो छोटी कहानी कहने की  एक सुप्रसिद्ध लोक विद्या है। जिसमें संदेश तो निहित होता ही है मारक क्षमता भी अधिक होती है। उन्होंने इस पर विस्तृत रुप से काम होने की बात कही तथा कहा कि कवि साहित्यकारों को इस पर जरुर कलम चलाना चाहिए।
मजदूरों का आह्वान,,,चलो आज एकमई हो जान
मजदूर दिवस 1 मई प्रसंग पर शुभदा मिश्र जी के सम्मान में आयोजित उक्त गोष्ठी में स्थानीय कवियों और साहित्यकारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और कविता एवं कहानी पाठ के माध्यम से अपने विचारों और संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया। इस अवसर पर  वरिष्ठ कवि/ साहित्यकार श्री कोशा जी ने मजदूरों पर आधारित अपनी चर्चित रचना,,फोरा परे जें हाथ म,,,मिट गे हे लकीर,,, पीरा के संसार में सबसे बड़े पीर,,,सुनाकर  मजदूरों की पीड़ा का बखान किया और  उपस्थितो से वाहवाही पाई। कथाकार/ कवि मानसिंह “मौलिक” ने  आकाशवाणी रायपुर से आगामी दिनों प्रसारित होने वाली कहानी  “मितान के शर्त” का पाठ किया वहीं उन्होंने शिव स्रोतम् कविता सुनाकर वातावरण को सरस मय बनाया। इसी तरह कवि एवं लोक कलाकार पप्पु “पौर्वात्य” कलिहारी ने मजदूर दिवस की रचना चलो हम एकमई हो जान,, का सस्वर पाठ कर गोष्ठी को नई उंचाई दी। वहीं ग्राम्य कवि  आनन्द राम सार्वा “अनंत” ने छत्तीसगढ़ी की मिठास भरी रचना- “छत्तीसगढ़ के हर काम में धुन भरे हे” ,,का तरन्नुम में गान कर श्रोताओं को रस विभोर किया । इस अवसर पर पवन यादव “पहुंना” ने संस्कारधानी की कला / साहित्य परंपरा का बखान कर उपस्थितों को भावविभोर करते हुए लोगों में साहित्य के प्रति नई ऊर्जा का संचार किया। इस दौरान कवि अलग राम “राऊत” की मजदूर दिवस पर लिखी कविता,,हाथ में परे हे फोरा,, छाती में परे हे,घाव / मैं मजदूर तो आंव”  चर्चा का विषय बना रहा। इसी तरह साहित्य समिति की कवयित्री सुषमा शुक्ला “अंशुमन” की नारी पर लिखी गई कविता,, बेटी जनती है ,,व कवयित्री रेशमी रश्मि साहू की रचना “नोनी” को भी सराहा गया।
साहित्यिक संवाद को बढ़ावा
इस अवसर पर उपस्थित सभी साहित्य प्रेमियों ने ऐसे आयोजनों की निरंतरता पर बल देते हुए कहा कि इससे न केवल साहित्यिक संवाद को बढ़ावा मिलता है, बल्कि नई प्रतिभाओं की रचनाएं भी सुधरती है और उन्हें मंच प्राप्त होता है।
इस गरिमामय आयोजन का बौद्धिक संचालन पप्पू”पौर्वात्य’ कलिहारी ने किया। कार्यक्रम का समापन आपसी संवाद, विचार-विमर्श और साहित्यिक सौहार्द के साथ हुआ, जो लंबे समय तक उपस्थित कवि साहित्यकारों‌ के मन में अपनी छाप छोड़ गया। कार्यक्रम का संचालन पप्पू ,”पौर्वात्य’ ने की ।

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