राजनांदगांव/खैरागढ़ —
दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “हर घर जल” को देश का सबसे बड़ा जनहित अभियान बता रहे हैं, लेकिन खैरागढ़ में यह योजना अब पानी से ज्यादा “आपत्तियों” में बहती दिखाई दे रही है। यहां हालात ऐसे हैं कि पाइपलाइन जमीन में पहुंच चुकी है, टंकियां खड़ी हो चुकी हैं, मजदूरों का पसीना सूख चुका है… लेकिन भुगतान की फाइलें अब भी सरकारी टेबलों पर ‘विचाराधीन’ अवस्था में पड़ी हैं।
सबसे ज्यादा नाराजगी अब उस नई आपत्ति को लेकर सामने आ रही है, जिसमें भुगतान के लिए “लेबर लाइसेंस” मांगा जा रहा है। ठेकेदारों का कहना है कि नल-जल योजना में मजदूर स्थायी नहीं होते। गांवों में रोज मजदूर बदलते हैं — कोई दो दिन काम करता है, कोई हफ्तेभर, कोई बीच में ही छोड़ देता है। ऐसे में हर मजदूर का रिकॉर्ड और लाइसेंस तैयार करना जमीनी हकीकत से बिल्कुल अलग बताया जा रहा है।
ठेकेदारों की सबसे बड़ी दलील यह है कि उनके हर बिल से पहले ही शासन द्वारा 1 प्रतिशत लेबर उपकर काटा जाता है। इसके अलावा जीएसटी प्रणाली में भी 18 प्रतिशत तक टैक्स और श्रमिक मद से संबंधित राशि की कटौती होती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब हर भुगतान में पहले से श्रमिक मद में कटौती हो रही है, तो फिर रनिंग बिल रोककर “लेबर लाइसेंस” को नई आपत्ति बनाना आखिर किस नियम की नई व्याख्या है?
ठेकेदारों का कहना है कि जब आधे से ज्यादा काम पूरा हो चुका है, तो रनिंग बिल उनका अधिकार बनता है। उसी पैसे से मजदूरों की मजदूरी, मशीनों का किराया, डीजल और सामग्री का खर्च चलता है। लेकिन यहां व्यवस्था ऐसी बना दी गई है कि पहले काम पूरा करो, फिर आपत्तियों का पहाड़ चढ़ो और आखिर में सुनो —
“अभी प्रक्रिया चल रही है…”
स्थानीय स्तर पर अब यह चर्चा भी तेज हो गई है कि “हर घर जल” योजना की गति पाइपलाइन से नहीं, बल्कि फाइलों की नोटिंग से तय हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें न लेबर लाइसेंस समझ आता है, न रंग-कोडिंग और न तकनीकी आपत्तियां। उन्हें सिर्फ इतना दिख रहा है कि गांव में नल लग गया, पाइप बिछ गया, लेकिन पानी अब भी नहीं आया।
गांवों में अब लोग तंज कसते हुए कहने लगे हैं —
“यहां पानी कम, आपत्तियां ज्यादा बह रही हैं!”
ठेकेदारों का यह भी आरोप है कि दूसरे जिलों में ऐसी प्रक्रियाओं को फाइनल बिल के समय देखा जाता है, ताकि काम प्रभावित न हो। लेकिन खैरागढ़ में मानो “काम से ज्यादा आपत्ति” ही प्राथमिकता बन गई हो।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है —
क्या नियमों की आड़ में योजना की रफ्तार रोकी जा रही है?
क्या रनिंग बिल रोककर खुद “हर घर जल” योजना को ही संकट में डाला जा रहा है?
और आखिर इतनी शिकायतों के बाद भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
जिले में अब लोगों की नजर जिला प्रशासन पर टिक गई है। चर्चाएं तेज हैं कि अगर समय रहते हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो “हर घर जल” योजना कहीं “हर फाइल कल” बनकर ही न रह जाए।
अंतिम कटाक्ष:
“यहां पाइपलाइन जमीन में गड़ी है…
भुगतान फाइल में पड़ा है…
मजदूर इंतजार में खड़ा है…
और सिस्टम कह रहा है — ‘नई आपत्ति अभी बाकी है!’”
