राजनांदगांव।
पंचायत चुनाव में करारी शिकस्त झेलने वाले अशोक देवांगन और रोहित चंद्राकर का संगठनात्मक पदों की दौड़ में शामिल होना भाजपा में खलबली मचाए हुए है।
पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये वही नेता हैं जो गांव में 15–20 वोट तक न जुटा पाए, लेकिन अब मंचों पर सबसे आगे खड़े होकर नेताओं के चरणवंदन और चाटुकारिता का प्रदर्शन करने में व्यस्त हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा में अब मेहनत और जनता का समर्थन नहीं, बल्कि हारने और ताली बजाने की योग्यता ही तरक्की की सीढ़ी बन चुकी है?
भीतरखाने चर्चाओं में यह बात जोर पकड़ रही है कि अगर ऐसे “पिटे मोहरे” ही संगठन में जगह पाएंगे तो दिन-रात मेहनत करने वाले असली कार्यकर्ताओं का हौसला टूटना तय है। कटाक्ष करते हुए एक कार्यकर्ता ने कहा – “भाजपा में अब हार का सर्टिफिकेट ही पद की गारंटी बन गया है।”
स्थिति यह है कि जहां जनता और कार्यकर्ता जीतने वालों को महत्व देने की उम्मीद कर रहे हैं, वहीं संगठन हारने वालों को गले लगाने में मशगूल है। अब बड़ा सवाल यही है – क्या भाजपा में पद योग्यता और जनता की नब्ज से मिलेंगे या फिर नेताओं की चापलूसी और चरणस्पर्श से?
