*इंसानियत ला जगाओ गा*
एसो बइसाख के घाम हा अलकरहा जनावत हे।
तरिया,नदियां,कुंआ, बोर हा ठाड़ छुट्टी मनावत हे।।
जंगल के पेड़ ला काट के घर,कंपनी बनावत हे।
अतका निर्दयी होगे मनखे गऊ पानी नइ पावत हे।।
नइ बाचिस पेरा,भूसा,मेड़ मा तक आगी बारत हे।
मोर हरे मोर कहिके जी कतका लबारी मारत हे।।
का हो ही एखर दूरगामी परिणाम सबला जान के।
आजे के अपन काम ला खुदे काली बर टारत हे।।
नइ होवय कोनो ककरो नाती, बबा दूनो जानत हे।
मोर असन ला कोन कहे बड़े_ बड़े के नइ मानत हे।।
अपन सुवारत बर आज गऊ ला घर ले निकालत हे।
करनी दिखे मरनी के बेर अपने बर गड्ढा खानत हे।।
चलो जी जुर मिल हमन एक अभियान चलाबो न।
अपन घर के दुवारी मा छोटकन कोटना लगाबो न।।
गऊ माता, जीव, जंतु घुमत – फिरत तीर मा आही।
मन भर पीही पानी दीही आशीष सबला बताबो न।।
मनखे कोनो तीर जाके नगदी उधारी पानी पी लेथे।
बिन मुंहू के जानवर चल देथे ता मार अउ गारी देथे।।
अपन _अपन भीतर के इंसानियत ला जगाओ गा।
का करही बपरी भूखे प्यासे रहिके सबला सही लेथे।।
तुलेश्वर कुमार सेन
सलोनी राजनांदगांव
