राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ में लागू हुए धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ईसाई समुदाय के विरोध के बीच अब इस कानून को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। क्रिश्चियन वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष क्रिस्टोफर पॉल ने बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अधिनियम को रद्द करने की मांग की है।

याचिका में कहा गया है कि कानून का उद्देश्य जबरन धर्म परिवर्तन को रोकना होना चाहिए, लेकिन इसकी भाषा पक्षपातपूर्ण है। अधिनियम के अध्याय 3, कंडिका 3 में ‘प्रिस्ट/फादर’ और ‘मौलवी’ शब्दों का उल्लेख किया गया है, जबकि ‘पंडित’ या अन्य धर्मगुरुओं का जिक्र नहीं है। इसे आधार बनाकर याचिकाकर्ता ने कानून को भेदभावपूर्ण बताया है।

क्रिस्टोफर पॉल का आरोप है कि यह कानून व्यवहार में केवल ईसाई और मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाता है। उन्होंने इसे “टारगेटेड लेजिस्लेशन” बताते हुए कहा कि यह संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है।

संवैधानिक आधार पर दी चुनौती

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि राज्य किसी विशेष वर्ग या धर्म को लक्षित कर कानून नहीं बना सकता। यदि कानून की भाषा केवल कुछ धर्मों तक सीमित है, तो यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

साथ ही, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि कानून की भाषा निष्पक्ष होनी चाहिए। ‘धार्मिक पदाधिकारी’ जैसे सामान्य शब्दों का उपयोग किया जाना चाहिए, न कि किसी एक धर्म विशेष के पदनामों का।

अब इस मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई अहम मानी जा रही है। इस याचिका के जरिए कानून की संवैधानिक वैधता पर बड़ा फैसला सामने आ सकता है।

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